
माँ बाप सम कौन नियंता
गत दिनों दुर्भाग्य से नगर की एक बुजुर्ग महिला की अन्त्येस्ठी में जाना पड़ा मुक्तिधाम में बैठे हुए हम में से कुछ लोगों के बीच चर्चा होने लगी बुजुर्गों के अनुभवों पर तब अनायास ही मुझे नगर की ही एक महिला की स्मृति हो आयी जिनका स्वर्गवास लगभग सौ वर्ष की अवस्था में हुआ था जीवन के सांध्य समय में अक्सर ही वे हमारे घर आ जाया करती थी तब अपने पारिवारिक अनुभवों को अपने दुखों को हम लोगों के साथ बाँट लेती थी शायद उन्हें इससे कुछ शकुन मिला करता था एक दिन जब उन्होंने यह बताया की मैं बस अभी अभी भोजन बनाकर एवं खाकर आयी हूँ तो अनायास ही मैं पूछ बैठा की दादी बेटे बहुओं के रहते हुए भी इस उम्र में भोजन बनाने की जरुरत क्यों पड़ जाती है तब उन्होंने बड़े ही हास परिहास भरे मुड में कहा की
^^ अनेकों बेटे राम के कौड़ी के न काम के ** .होने को तो यह उनकी व्यक्तिगत पीड़ा हो सकती हैं किन्तु आज के परिपेक्ष्य में यदि हम परिवार में अप्रासंगिक होते जा रहे माँ बाप पर सोचे तो यह बात मर्मान्तक रूप से ह्रदय को बेध जाती है. यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से दिमाग में मचलने लगता है कि क्या बच्चों को जन्म देने वाले माँ बाप सचमुच ही इतने अप्रासंगिक हो जाते है कि वे बच्चों को बोझ लगने लगते हैं? सच में ही हमारी आज की जीवन पध्द्हती क्या हमे इतना स्वार्थी बना चुकी है कि हम अपने जन्म दाता माता पिता के लिए थोडा सा भी समय नहीं निकल पाते?शायद अधिकांश किस्सों में यह बात ठीक बैठती है.नेत्र रोग निदान शिविर के एक समारोह में एक वक्ता द्वारा कही गयी यह बात मुझे बार बार याद आती है कि
इस दुनिया में हर चीज का पकना आदमी को पसंद आता है पककर हर चीज की मिठास बढ़ा जाती है सिर्फ मनुष्य का पकना ही किसी को भी मीठा नहीं लगता. ऐसे ही एक नेत्र शिविर में एक बुजुर्ग का इलाज किया गया था प्रभु कृपा से उनकी आँखें ठीक हो गयी थी और जब दूसरे वर्ष हमारी संस्था ने पुनः नेत्र शिविर लगाने की घोषणा की तब वह बुजुर्ग मेरे पास आया और उसने निवेदन किया की उसे इस शिविर में कोई भी काम दिया जावे वह उसे करने को तैयार है जब हम लोगों ने उससे चर्चा की तो उसका कहना था कि गत वर्ष जब उसका ऑपरेशन शिविर में किया गया था उसके पहले उसे कुछ दिखाई नहीं देता था अनेकों बार उसने अपने बच्चों से निवेदन किया था किन्तु किसी भी लड़के ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया इसलिए वह चाहता है कि उसकी सहभागिता से ही शायद बच्चों के द्वारा नकारे गए किसी बुजुर्ग को फिर से आँखें मिल जाये.
यह वाक्य इस बात पर मनन करने को मजबूर कर देता है कि पुरानी पीढ़ी की अपेक्षा हमारी आज की पीढ़ी में आखिर कर संवेदन शीलता कम क्यों होती जा रही है. एक बुजुर्ग ने अत्यंत ही मर्मान्तक ढंग से यह बात कही कि जब भी मैं अपने बच्चों कि उपेक्षा का दंश झेलता हूँ प्रभु से यही मांगता हूँ कि हे भगवान अब तो मुक्ति दे दे. और जब भी मेरे से छोटा कोई मुझसे आशीर्वाद चाहता है तो उसे यही आशीर्वाद देता हूँ कि उसे मेरी तरह की स्थितियों से न गुजरना पड़े बच्चों की उपेक्षा न बर्दास्त करनी पड़े.
इस विषय पर अपने मनोभावों को लिखते हुए मुझे अचानक ही कविवर ओम व्यास की पंक्तिया जो मैंने गूगल के माध्यम से ही सुनी याद हो आती हैं कि
^^ वे खुस नसीब होते हैं माँ बाप जिनके साथ होते हैं
क्योंकि माँ बाप के आशीषों के हाथ हजारों हाथ होते है
दुनियां में माँ बाप की कमी को कोई भी पात नहीं सकता
और ईश्वर भी इनके आशीषों को काट नहीं सकता **
यदि हम परमात्मा पर विश्वाश करते हैं तो हमें निश्चित ही यह मन लेना चाहिए कि यदि वह परम सत्ता चाहती तो मानव का सृजन बिना माँ बाप के भी कर सकती थी किन्तु शायद वह परमसत्ता हर किसी के साथ कुछ न कुछ समय बिताना चाहती है शायद इसीलिए वह माँ बाप के रूप में इस दुनिया में अवतरित हुई अब शायद यह हर व्यक्ति के अपने अपने कर्मों का फल है कि उसे माँ बाप रूपी परमसत्ता की सेवा करने का कितना अवसर मिलता है.दुनिया में वे लोग निश्चित ही खुशनसीब होते हैं जिन्हें यह सौभाग्य लम्बे समय तक मिलता है.
यह सब लिखते हुए मुझे किसी के द्वारा लिखी हुई कुछ पंक्तियाँ याद हो आती है क्षमा चाहता हूँ कि याद नहीं कर पा रहा हूँ कि कंहा पढ़ी थी और किसकी लिखी हुई हैं
^^
माँ आज मैं जान सका हूँ कि
मेरे अबोलेपन के बाद भी क्यों समझ लेती थी तुम मेरी पीड़ा को
क्योंकि पीड़ा का तो जन्मा ही हुआ था शायद
किसी माता की प्रसव वेदना के साथ **
लेकिन दुर्भाग्य यह है की पाश्चात्य संस्कृति के भक्त हो रहे हम लोग माँ कि उपासना का अपना धर्म ही भूलते जा रहें है.
हाँ गत दिनों एक समाचार समाचार पत्रों के माध्यम से पढने को मिला जिसे सुनकर मन को यह तृप्ति हुई कि
अँधेरा अभी बहुत गाढ़ा नहीं हुआ है आशा कि किरण अभी बाकी है और भगवान करे कि यह किरण मशाल बनकर हम लोगों को रह दिखाए हाँ तो सुना गया समाचार यह था कि एक डॉक्टर जो सदा ही व्यस्त रहता है ने अपनी कैंसर से पीड़ित माता को उसकी इच्छा पूरी करने के लिए लगभग अपने कन्धों पर लेकर चारोंधाम की यात्रा कराई.आज के युग के उस श्रवण कुमार को नमन.
कागज पर इतना कुछ उतर देने के पीछे मेरा उद्देश्य किसी भी रूप में कोई भासन या उपदेश देना नहीं है यह तो उद्वेलित मन था जो अपनी बातों को अपनों के साथ बाटें बिना नहीं रह सका.कविवर ओम व्यास की माँ बाप पर लिखी कविता जो उन्होंने सहारा परिवार द्वारा स्व हरिवंश राय बच्चन की स्मृति में आयोजित कविसम्मेलन में सुनायी थी को जब भी सुनता हूँ मन उस पर चिंतन करने को विवश हो जाता है की आखिर हमारी आज की जिंदगी में फ़ैल रहे पाश्चात्यवाद के बीच हमारे बुजुर्ग क्यां अप्रासंगिक होते जा रहें हैं.काश कि परमात्मा हम में से हर एक को इतनी बुध्धि दे कि हम माँ बाप के द्वारा हमारे लालन पालन के लिए किये गए त्याग को देख सकें.