गुरुवार, 13 सितंबर 2012

जीवन की आपाधापी में 
कंहा एक छण भी विश्राम मिला
मन के भावों को व्यक्त करने
कंहा कोई आयाम मिला 
जिधर भी गयी नजर 
हर तरफ ख्वाहिशें ही ख्वाहिशें 
कंहा भला प्यार भरा कोई पैगाम मिला
अब तो बात यही आती है समझ में 
स्वार्थ कि इस दुनिया में अपनों ने भी 
स्वार्थों को खूबसूरती से प्यार का है नाम दिया 

4 टिप्‍पणियां:

  1. छोटी मगर विचारशील कविता के लिए बधाई...इसी तरह लिखते रहे.

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  2. बढिया कविता…… लिखते रहिए आगे बढते रहिए।

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  3. अपना नजरिया, लेकिन शुक्र कि खूबसूरती बची हुई है.

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  4. आप हिंदी भाषा में विचार व्यक्त कर रहे हैं.... यही हमारी प्रसन्नता का कारण बना है.
    आप नासमझी में ही इतनी पते की बात कहते हैं कि 'हरिवंश जी' की याद दिला देते हैं.
    .......... भावों को मुक्तछंद में कहना भी एक कला है. और वह आप जानते हैं. साधुवाद.

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