शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

सुनो तो सही
मैं 
मांगने आई हूँ 
तुमसे सिर्फ इंतनी सी दया 
की ऐ दरिंदों मुझे सिर्फ इस लायक 
छोड़ दो की आईने में 
देख सकूँ मैं अपना चेहरा 
क्योंकि जानती हुए मैं 
की तुम्हारे माँ बाप 
भी नहीं जुटा  पाते  होंगे  इंतना साहस 
कि वे देख सके आईने में 
अपने चेहरा 
क्योंकि 
तब उन्हें निश्चित ही आएगी शर्म 
कि उन्होंने किस रूप 
में इस संसार में उतरा 
है अपना प्रतिरूप 

शनिवार, 8 दिसंबर 2012


न  जाने क्या पाने को जी चाहता है 
तेरी रहमत का है ये भी एक दौर मालिक 
कि सब कुछ भुलाने को जी चाहता है 
तूनें तो बख्सी दुनिया की सारी नियामतें मुझे 
पर तुझी से मुंह छुपाने को दिल चाहता है 
है कौन इस जहाँ में जिस मिला हो शकू 
ये जानते हुए भी शकुन पाने को जी चाहता है 
किस्मत की लिखी जिसे लोग कहतें हैं 
उसे अपनी हिम्मत से मिटने को जी चाहता है 
सब जानकर भी गुनाह पर गुनाह किये जा रहा हूँ 
अब तुझसे भी गुनाह छिपाने को जी चाहता है 
जनता हूँ नहीं तुझसे कुछ भी मांगने के काबिल मैं 
फिर भी मांगने की हिम्मत जुटाने को जी चाहता है 

सोमवार, 12 नवंबर 2012


चाहे टूट ही जाएँ सपने तो छोड़ते जाना 
फिर आ गए तुम नववर्ष 
नहीं भरा तुम्हारा मन अब भी 
देखकर दुर्दशा हमारी 
रिश्ते नाते सब स्वाहा हो गए 
इतनी भभक चुकी है 
स्वार्थ की अग्नि हमारी 
क्यों आ जाते हो तुम 
फिर परोसने नए सुहाने सपने 
जिन्हें फिर तोड़ जायेंगे 
रहनुमा ही मेरे अपने 
पर आ ही गए हो तो इतना सुनते जाना  
डर जाता था जब आहाट से मैं 
बीत गया वो जमाना 
अब अपने अधिकारों के लिए लड़ने की 
है हम सब ने ठानी 
भूल चुके है हम सब आदते पुरानी 
इसीलिए कर रहा हूँ स्वागत तुम्हारा 
बड़े मजे से आना 
चाहे टूट ही जाएँ फिर 
मेरी आखों में जीवन के सपने 
फिर एक बार छोड़ जाना 
























बुधवार, 24 अक्तूबर 2012


ये अट्टहास फिर 
आज फिर जला रावण 
हमेशा की ही तरह 
फिर मनाया मैंने बुराई पर अच्छाई 
की जीत का पर्व 
पर कुछ ही पलों बाद फिर 
जी उठा मेरे अन्दर का रावण 
करता हुआ अट्टहास 
बताता हुआ मुझे मेरी औकात 
कि चाहे उसे  कीतनी ही बार 
मार लूँ मै 
फिर जी उठेगा वह 
बनकर कभी मेरा लोभ 
तो कभी मेरे समाज का 
भ्रष्टाचार 
तो कभी और किसी रूप में 
पर जिन्दा रहेगा मेरे अन्दर 
क्योंकि शायद मै नहीं 
मारना चाहता उसे कभी भी जड़ से 

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

जीवन की आपाधापी में 
कंहा एक छण भी विश्राम मिला
मन के भावों को व्यक्त करने
कंहा कोई आयाम मिला 
जिधर भी गयी नजर 
हर तरफ ख्वाहिशें ही ख्वाहिशें 
कंहा भला प्यार भरा कोई पैगाम मिला
अब तो बात यही आती है समझ में 
स्वार्थ कि इस दुनिया में अपनों ने भी 
स्वार्थों को खूबसूरती से प्यार का है नाम दिया 
जीवन की आपाधापी में 
कंहा एक छण भी विश्राम मिला
मन के भावों को व्यक्त करने
कंहा कोई आयाम मिला 
जिधर भी गयी नजर 
हर तरफ ख्वाहिशें ही ख्वाहिशें 
कंहा भला प्यार भरा कोई पैगाम मिला
अब तो बात यही आती है समझ में 
स्वार्थ कि इस दुनिया में अपनों ने भी 
स्वार्थों को खूबसूरती से प्यार का है नाम दिया 

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

कुछ पंक्तिया
कहीं शायद पढ़ी हुई या सूनी हुई पंक्तिया
**ऐ माँ आज मैंने जाना
मेरे बचपन में मेरे अबोलेपन के बाद भी
क्यों जान समझ लेती थी तूँ
मेरी पीड़ा को क्योंकि
शायद पीड़ा का तो जन्म ही हुआ था
किसी माता की प्रशव वेदना के साथ**
आइये सोच कर तो देखें इन पंक्तियों पर और चिंतन करें अपने आप पर