गुरुवार, 10 मार्च 2011

जीजिविषा बढे मतभेदों के साथ

मुझे आज अचानक ही याद आ गया बचपन में देखा हुआ एक भिखारी जो एक लकड़ी की टूटी हुई गाड़ी पर लगभग घिसटता हुआ चला करता था साथ में हाथ में एक पत्थर सरीखे कुछ टुकड़े जिनसे कुछ अच्छी सी आवाज निकलने की कोशिश लोगों के सामने हाँथ फैलता हुआ वह चलता जाता था रास्ते भर इस उम्मीद पर कि कोई तो होगा आज जो उसे आज के खाने के लिए कुछ दे देगा कई बार उसे खाने का सामान देते हुए मैंने सोचा था कि आखिर यह आदमी जिन्दा क्यां रहना चाहता है ? क्या है ऐसा जो उसे इस दशा में भी जीने के लिए मजबूर कर रहा है ? एक दिन अपनी बालसुलभ चपलता से पूछ ही लिया उसे कि आखिर तूँ मार क्यों नहीं जाता तब उसने मुझसे कहा था कि मार तो जाता पर क्या करूँ दुनिया से मोह नहीं छूटता तब मै सोचा करता था कि आखिर आदमी को ऐसा कौन सा मोह है जो इस दुनिया से बांधे रखता है ?
यदि आज मैं उस बात को याद करता हूँ तो मुझे अनायास ही हँसी आने लगती है कि क्या उस आदमी ने उस समय झूट कहा था निश्चित ही नहीं हम में से हर कोई तो किसी न किसी मोह से जकड़ा हुआ है हर कोई किसी न किसी चीज के नशे में हैं कहा भी तो है न किसी ने किसी को दौलत तो किसी को जवानी का नशा** फिर अनायास ही यह भी सोचने लगता हूँ कि आखिर इस नशे से हमें छुटकारा मिलेगा भी तो कैसे. मेरे एक प्रोफेसर की कही हुए बात याद आ जाती है कि मनुष्य की जीजिविषा अनंतर होती है उसे कोई भी नहीं रोक सकता आज जीवन के लगभग तीसरे पण में यह याद आ रहा है यह सोच रहा हूँ कि क्या मनुष्य कभी इस जीजिविषा से छुट सकेगा कभी नहीं क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो शायद हर कोई संन्याशी हो जायेगा .
शायद मेरी जीजिविषा वाली बात से कुछ लोग सहमत न भी हों किन्तु यह मेरी आपनी सोच है कि मनुष्य की जीजिविषा लगातार निरंतर बढ़ती ही रहनी चाहिये और वह भी मतभेदों के साथ क्योंकि मतभेद तो होंगे ही तभी तो शायद हम जिन्दा भी है याद नहीं आता कि किस ने कहा था कि यदि हममें मतभेद न हों तो फिर हमारे बीच बात करने का विचार विमर्श करने का मुद्दा भी क्या राह जायेगा तब हम सब क्या मुर्दों से ज्यादा बेहतर होंगे,

8 टिप्‍पणियां:

  1. मनुष्य की जीजिविषा अनंतर होती है उसे कोई भी नहीं रोक सकता
    उन्होने ठीक कहा था....
    वाकई सभी को कुछ न कुछ चाहत होती है और वो इससे जुड़े रहते हैं...
    सीधे-सरल रास्ते अक्सर बोझिल हो जाते हैं...इसलिए कुछ अलग हटकर होना ही चाहिए...
    बहुत अच्छा लिखा है...

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  2. यही मोह तो दुनिया को बाँधे हुये है।

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  3. माया महाठगिनी हम जानी...

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  4. जिजीविषा जरूरी है । और आपकी बात से सहमत हूँ , मतभेद न हों तो बात क्या करेंगे ।

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  5. सत्य है और इसीलिए आने वाला कल दिखता नहीं..एक बेहतर की उम्मीद और आशा-सब बाँधे इसी जीजिविषा को लिए चले जा रहे हैं.

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  6. मोह भला कब छूटता है। आजकल तो सन्‍यासी भी मोहक हो गए हैं और लोगों का मोह रहे हैं।

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  7. संभवतः असहमतियों से आपका आशय मनुष्यों के मध्य निरंतर संवाद और निरंतर संपर्क से है ! आपसे सहमत !

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  8. आखिर आदमी को ऐसा कौन सा मोह है जो इस दुनिया से बांधे रखता है ?
    विचारणीय प्रश्न है....

    आपका ब्लॉग है........ नासमझ की बात.
    और समझदारी भरी ....सारगर्भित पोस्ट......
    वाह..क्या खूब लिखा है आपने।

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