शुक्रवार, 4 मार्च 2011

पुस्तकालयों की स्थापना

पुस्तकालयों की स्थापना
इस साल के सरकारी बजट को देख कर यह सुखद एहसास हुआ कि शासन द्वारा इस साल कुछ जगहों पर पुस्तकालयों की स्थापना के लिए राशी दी गयी है निश्चित ही यह संतोष जनक है क्योंकि जिन लोगों को पढने का शौक है वे ही जानते है कि पुस्तकों का क्या महत्व है ? मुझे मेरे एक शिक्षक याद है जो यह कहा करते थे कि रात को जब तक मैं कुछ पढ़ न लूँ तो मुझे नींद नहीं आती . तब मैं सोचा करता था कि आखिर पुस्तकों में ऐसा क्या है जो आदमी इस हद तक पुस्तकों का दीवाना हो जाता है. धीरे धीरे यह आदत मुझे भी लगी और मैं सौभाग्यशाली हूँ कि आज भी मेरी यह आदत बरक़रार है आज भी मन में एक इक्छा रहती है कि कहीं कुछ समय मिल जाये तो थोडा सा ही सही पढ़ लिया जाये (यह अलग बात है कि जीविका कि मजबूरी में अब इसके समय बहुत ही कम निकल पता हूँ ) .
अपने छोटे से नगर में लोगों ने कृपापूर्वक मुझे एक स्कूल चलाने की जिम्मेदारी दे रखी है सौभाग्य है कि मेरी स्कूल में एक अच्छा पुस्तकालय है जो स्कूल के प्रारम्भ में ही आज से ४५ वर्ष पूर्व स्थापित किया गया था इस पुस्तकालय में लगभग ५००० ऐसी पुस्तकों का संग्रह है जिनमे से अनेकों अब प्रिंट में नहीं है और यदि कुछ रीप्रिंट हुई भी है तो उनकी कीमत इतनी है कि उसे खरीद कर पढना एक सामान्य व्यक्ति के बस की बात नहीं है .
समय समय पर जब मैं स्कूल जाता हूँ तो वंहा के पुस्तकालय में पदस्थ शिक्षक से जब बात होती है तब यह जानकर अति दुःख होता है कि पुस्तकालय से पुस्तकें निकल कर पढने वाले लोग अब बहुत ही कम रह गए हैं तब मुझे मेरा उसी स्कूल में बिताया समय याद आ जाता है जब एक ही पुस्तक को पढने के लिए अनेकों छात्र प्रतीक्षा किया करते थे .
शायद मै मूल विषय से भटक रहा हूँ प्रश्न तो फिर भी वही है कि यह अच्छी बात है कि सरकार द्वारा पुस्तकालयों की स्थापना के लिए राशि दी जा रही है किन्तु इन पुस्तकालयों में संग्रहीत की जाने वाली पुस्तकों को कितने लोग पढेंगे ? क्या कुछ ऐसा प्रयास भी किया जायेगा कि लोग पुस्तकों की तरफ आकर्षित हों और यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो मुझे तो यही समझ में आता है कि ये पुस्तकलय भी तथाकथित बुद्धिजीवी लोगों के ड्राइंग रूम की शोभा के तरह किसी स्थान विशेष की शोभा बनकर राह जायेंगे.और आने जाने वाले लोगों को अपनी शान बघारने के उद्देश्य से दिखाए जायेंगे यह बताया जायेगा कि हमारे पुस्तकालय में इतनी पुस्तकें हैं भले ही बताने वाले को उन पुस्तकों और उनके लेखकों के बारे में जानकारी नगण्य हो.
एक छोटी सी घटना का उल्लेख करना चाहता हूँ एक बड़े शहर में एक पुस्तक दुकान में गया और अटल जी की कविताओं का संग्रह मांग बैठा उस दुकानदार ने मुझे बड़े ही आश्चर्य से देखा और पूछा कि क्या अटल जी भी कविताएँ करते हैं जबकि उनका दावा था कि साहित्यिक पुस्तकों का उनकी दुकान से अच्छा संग्रह और कहीं नहीं मिल सकता क्या कहा जाये इसे ?
दुर्भाग्य जनक है कि आज पढने की प्रवृत्ति लगातार कम होते जा रही है पुस्तकालयों की स्थापना अवश्य ही अच्छी बात है किन्तु और भी अच्छा होगा यदि इनकी शुरुवात स्कूल के स्तर से की जाये यह प्रयाश कीया जावे कि छात्रों में पढने की कुछ तो आदत बने क्योंकि छात्र जीवन से पड़ने वाली पढने की आदत ही शायद स्थाई आदत बान सके और इन स्थापना के लिए प्रस्तावित पुस्तकालयों की उपादेयता सिद्ध हो सके अन्यथा तो वही होगे ड्राइंग रूम की शोभा वाली बात.
मेरे अपने मन की पीड़ा को आप के साथ बाँटने का मेरा यह प्रयास है

13 टिप्‍पणियां:

  1. smt veena se mail par prapt pratikriya
    हां यह सच है आज लोग किताबों और पढ़ने की आदत से दूर होते जा रहे हैं.....जीवन की गतिशीलता भी इतनी बढ़ गई है जो चाहते हैं वह भी समय नहीं निकाल पाते..वैसे जिनको निकालना होता है वह समय निकालकर पढ़ते ही हैं यह आदत जिनको है वही इसका मूल्य भी जानते हैं...
    बहुत अच्छा लिखा है....बधाई

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  2. mobile, Internet aur tv ne pustsko va pustkalyon ko chhatro aur yuvaon ko jis kadar prabhavit kiya hai usse chinta hoti hai. aise mein pustakalyon ke vikas ki baat utsah badane vali hai. alag se is khabar ko apne blog mein post karke is oor logon ka dhyan dilane ke liye dhanyavad.

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  3. बात तो चो्खी है आपकी।
    पुस्तकालय के साथ पठन की रुची भी होनी चाहिए। सरकार जिन को राशि दे रही है पुस्तक खरीदने के लिए,उन्हे ही नहीं पता कौन सी पुस्तक खरीदनी चाहिए?

    अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर।
    सार्थक आले्ख के लिए आभार।

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  4. आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ..... पुस्तकालय बहुत ज़रूरी हैं..... किताबें हमारे जीवन का हिस्सा हो इससे अच्छा क्या हो सकता है.....

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  5. पाठक ही पुस्‍तकालय की प्राणधारा हैं, जो उसे प्रासंगिक बनाए रखते हैं.
    अकलतरा स्‍कूल की प्रतिभाओं को निखारने में यह पुस्‍तकालय महत्‍वपूर्ण रहा है.
    आपने बजट के इस कम चर्चित लेकिन उल्‍लेखनीय पक्ष की ओर ध्‍यान दिलाया है.

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  6. विद्यार्थियों में वास्तव में पढने की आदत होनी चाहिए । स्कूलों में library होती है , जिसे और विस्तार दिया जाना चाहिए । हर तरह की पुस्तकें उबलब्ध होनी चाहिए , जिससे लोगों की रूचि उसमें बढ़ सके ।

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  7. हर नगर में सार्वजनिक पुस्तकालय हों।

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  8. यह तो सत्य है पढने की प्रवृत्ति लगातार कम होते जा रही है
    आप का ब्लॉग लेख पड़ा तो मुझे गारमेन्ट स्कुल बिलासपुर के हमारे गुरु आदरणीय चौहान साहब की याद आ गई . वो हमेशा अच्छी अच्छी पुस्तके पड़ने के लिए कहते थे .और क्यों यह भी समझाया करते थे अंग्रेजी तो हमने चौहान साहब से कम पढ़ी है पर जीवन को देखने के नजरिये को खूब सुना पढ़ा पर व्यवहारिक जीवन में उतरा नहीं ..
    शायद हमने भी पुस्तकों को महत्व नहीं दिया और अखबारों की खबरों में मग्न रहे
    कन्देलिया जी शानदार पोस्ट ..आप के विचारो से सहमत हूँ

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  9. जी आप की बात से सहमत हुं, रुचि कम क्यो हो रही हे...? क्योकि पहले गह्र मे मां बाप भी बच्चो को अच्छा सहित्या पधने की प्रेरणा देते थे ओर स्कुल मे भी टीचर अच्छी किताबे ही पढने को कहते थे.... ओर आज ना वो मां बाप हे, ना ही वो मास्टर ओर ना ही वो बच्चे, यानि सब चोपट होता जा रहा हे, बच्चो को प्यार से ही समय नही मिलता तो क्या पुस्तके पढे.....

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  10. सबसे पहले पढ़ने की आदत और पुस्तकों से प्रेम पर आपको साधुवाद ! यह महत्वपूर्ण है कि इस सृजनात्मक / सकारात्मक अभिरुचि को राज्य का समर्थन प्राप्त हुआ है पर ...
    मेरा व्यक्तिगत अभिमत ये है कि पुस्तकालयों को राज्य की अपेक्षा सामाजिक / पारिवारिक समर्थन की आवश्यकता अधिक है ! नागरिकों के स्वस्फूर्त यत्न होने की दशा में यह ,राजकीय अनुदान और प्रक्रियागत प्रपंचों की तुलना में अधिक कारगर / उपयोगी सिद्ध होगा ऐसा मुझे विश्वास है !
    आपकी पोस्ट पर टिप्पणियां पढते हुए एक बात यह भी कहना है कि जब कागज का आविष्कार नहीं हुआ था पुस्तकें तब भी थीं , शिलाओं पर , चर्म पर , ताम्र / ताड़ पत्रों पर या अन्य किन्हीं माध्यमों पर ! इसलिए आगे जब कभी कागज नहीं रहेगा , तो क्या ? पुस्तकें फिर भी रहेंगी ! नई शक्ल में , इलेक्ट्रानिक माध्यमों या शायद किसी नये स्वरूप में !
    अतः पुस्तकों और पुस्तकालयों की एक विशिष्ट स्थिति / शक्ल के आग्रह नहीं होने चाहिए ! समय के साथ हम बदल रहे हैं तो हमारी पुस्तकें भी बदलेंगी !

    बहरहाल एक लंबी अनुपस्थिति के बाद आप आये और एक अच्छी पोस्ट लिखी उसके लिए आपका आभार !

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  11. उचित बात कह रहे हैं आप. विचारणीय.

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  12. पुस्‍तक पढ़ने और पुस्‍तकालय को बढ़ावा देने के लिए कई संस्‍थाएं काम काम रही हैं। उनका असर भी हो रहा है। लगभग तीन साल पहले मैंने राज्‍यशिक्षा संस्‍थान मप्र के लिए एक किताब का संपादन किया था जिसमें बच्‍चों को किताबों की ओर आकर्षित करने के लिए गतिविधियां दी गईं हैं। किताब का नाम है- किताबों की किताब।

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  13. मुझे लगता है आप सभी की बाते बिलकुल सही है पर क्या आपने गौर से इसके कारणो के विषय मे जानने की कोशिश की मुझे लगता है की इसमे हमारी ही गलती है हम ही इसके जिम्मेदार है अगर हमने अपने अंदर पुस्तकों को लेकर सकारात्मक रुख़ अपना लिया तो निश्चित रूप से इस सं

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