शनिवार, 14 जनवरी 2012

क्या सोचूं क्यों सोचूं
क्या क्या सोचूं क्या क्या याद करूँ
क्या क्या भूल जाऊ
छोटा सा जीवन वृत्त मेरा
कितनी बातों के लिए याद रखेगा
कोई इसे
और याद रखने के लिए है भी क्या उसमें
सिवाय इसके कि जीया है मैंने
एक निरर्थक जीवन
अपने ही लिए
एक क्षण के लिए भी तो नहीं हो सका
मैं समाज का देश का
सोच नहीं सका अपने कर्तव्यों के बारे में
सिवाय इसके कि खा लूँ सो जाऊ
उठ कर हर सुबह
फिर से जीवन के निरर्थक मायने को तलाशने
का करूँ असफल प्रयाश
हे प्रभु कुछ तो सदबुधि दे मुझे
कि मैं भी सोच सकूँ कुछ तो औरों के बारे में भी

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खुब अगर हम सब की यही सोच हो जाये तो यह देश स्वर्ग से सुंदर बन जाये. धन्यवाद

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  2. शायद एक आम जीवन यूँ ही गुजर जाता है- हम सब उसी नांव पर सवार हैं.

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  3. अपने के बाहर भी सोच का दायरा जाना आवश्यक है।

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