बुधवार, 18 जनवरी 2012

काश कि हमारी सोच बदलती
एक छोटी सी घटना ने आज मेरे दिलोदिमाग को झकझोर दिया हुआ यूँ कि मुह्हल्ले में कुछ स्ट्रीट लाइट बंद थी एवं लोगों में नाराजगी थी कि स्थानीय प्रशासन याने नगर पालिका इस पर ध्यान नहीं दे रही है हर कोई इस बात पर नगरीय प्रशासन को कोष रहा था तभी एक व्यक्ती जिसे मोह्हल्ले के लोग बडबोला कहतें है ने एक ऐसा प्रश्न उछाला कि सभी की बोलती बंद हो गयी उस व्यक्ति का कहना था कि कल तक तो यह बल्ब ठीक था और रात को ही एक विघ्नसंतोषी लड़के ने इसे तोडा तब यहाँ उपस्थित एक सज्जन उसे ऐसा करते हुए देख रहे थे तब क्या उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वे उसे ऐसा करने से रोकते लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया फिर आज वे किस अधिकार से नगर पालिका को दोषी ठहरा रहें है क्यों वे नगर पालिका से उम्मीद करते हैं कि वह लोगों द्वारा किये जाने वाले नुकसान को भरती रहें और उन महाशय ने स्वयं तो पालिका के करों का भुगतान किया नहीं फिर उन्हें यह क्यों नहीं सोचना चाहिए कि आखिर पालिका के पास धन कहाँ से आयेगा .
इस घटना ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि हम सिर्फ अपने अधिकारों के ही बारें में क्यों सोचतें है इस बात पर विचार क्यों नहीं करते कि हमारे अधिकार तो हमारे हैं लेकिन हमारे कर्तव्य भी तो हैं जिन्हें निभाने में हम बिलकुल भी जागरूक नहीं है जब भी कभी हमारे कर्तव्यों की बात आती है हम मुंह छुपाने में छण भर भी देर नहीं लगाते यदि उस दिन उन महाशय ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया होता उस उदंड या नासमझ बालक को बल्ब फोड़ने से रोका होता तो न तो उन्हें परेशानी झेलनी पड़ती और ना ही पालिका पर नाराज होने या ऑफिस के चक्कर लगाने की जरुरत पड़ती किन्तु हम लोग तो शायद सिर्फ अधिकारों को ही समझने के आदि हो गए हैं यदि कोई हमारे कर्तव्यों के बारे में हमसे बात भी करता है तो हमें गुस्सा आता है कर्तव्यों की बातें हमें सिर्फ पुस्तकों तक ही अच्छी लगती है यदि कभी कोई हमें अपने कर्तव्य याद भी दिलाये तो हमें लगता है मानो वह हमें उपदेश दे रहा है और शायद ऐसा इस लिए भी है कि जो लोग हमें कर्तव्यों की याद दिलाते है वे स्वयं भी पर उपदेश कुशल बहुतेरे के ही सिद्धांतों पर चलते नजर आते हैं यदि हम चाहते हैं कि वास्तव में हमें सारी सुविधाएँ सारी सहूलियतें मिलाती रहें तो हमारा यह दायित्व निश्चित ही है कि हम दूसरों की भी तकलीफों को समझकर बात करें यहाँ एक उदहारण देना चाहता हूँ मेरे नगर अकलतरा में रेलवे का एक ओवर ब्रिज शहर के मध्य से गत ७ वर्षों से निर्माणाधीन है प्रारंभ में जब कुछ लोगो ने इस स्थान विशेष पर इसके निर्माण का विरोध किया तो अधिकांश लोगों ने इससे कोई सरोकार नहीं रखा बल्की यह तक कहा कि कुछ लोग नेतागिरी झाड़ रहें हैं आज उसमे से ही कुछ लोग इसी निर्माण के कारण अत्यंत तकलीफ में है तब उन्हें याद आ रहा है कि इस ब्रिज के लिए स्थान का चयन गलत था उनका कहना है कि उन्हें अंदाजा नहीं था कि निर्माण के दौर में उन्हें इतनी परेशानियाँ उठानी पड़ेंगी I
हममें से हर कोई आज सहूलियतों को भोगने का आदि हो गया है हम यह कतई नहीं सोचना चाहते कि जो सुविधाएँ हमें मिल रही हैं या जिन सुविधाओं की हम मांग करते हैं उन्हें पाने के लिए हमारे जो दायित्वा हैं उनका निर्वहन भी हमारी जिम्मेदारी है I
दुर्भाग्य ही है कि अधिकारों की बात करनेवाले हम लोग कर्तव्यों से मुंह छिपाते हैं और यदि कुछ लोग इस दिशा में प्रयास भी करें तो उनकी आलोचना करने में पीछे नहीं रहते उनके द्वारा की जाने वाली निस्वार्थ समाज सेवा पर भी नेतागिरी का मुल्लम्मा चढाने में बिलकुल नहीं हिचकते कहीं पढी हुई कुछ लाइन याद आ रही है कि
" काश किसी ने भिक्षा के रूप में ही दिया होता
काश मैं दीक्षा के रूप में ही लिया होता
अपने लिए तो जीता है हर कोई
काश पल दो पल ही सही मैं भी औरों के लिए जिया होता "
परमात्मा करे एक बार हम सोच को बदल कर तो देखने की हिम्मत जुटा पायें तब शायद हम इस लायक बने कि अपने अधिकारों की बात कर सकें अन्यथा तो हमाम में हम सभी नंगे ही हैं श्रद्धेय बालकवि बैरागी जी की कुछ पंक्तियाँ फिर याद हो आती है कि
"मैं समय पर कह रहा हूँ अब भला क्या शेष है
हम निरंतर बुझ रहें हैं इससे का क्लेश है
जो दिया बुझकर पड़ा हो वह भला किस कम का
यह समय बिलकुल नहीं है ज्योती के आराम का
हाय रे समय है अब भी आग को अपनी जगाओ
बाट मत देखो सुबह की एक दीपक जलाओ "

4 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा आपने, यदि व्यवस्थाओं को कोसने में लगी ऊर्जा का आधा भी हम उन्हे सुधारने में लगा दें तो स्वर्ग आ जायेगा धरती पर।

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  2. निश्चित ही विचारणीत तथ्य प्रस्तुत किया है...

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