रविवार, 4 मार्च 2012

ऐ पुष्प
ऐ लाल पुष्प देखता हूँ जब भी
तेरे खुबसूरत रंग
सोचता हूँ कहाँ गयी वो तेरी
खुशबु जो रची बसी थी मेरे
नथुनों में तेरे रंगों के साथ
मै बात कर रहा हूँ तब की
जब बना करता था तू
मेरा साथी अपने से
अपने खुबसूरत रंगों के साथ
जीवन हुआ करता था रंगीन
त्यौहारों के अवसर पर
तब तू और हम एक दूसरे के
बन जाते थे पूरक
पर आज तो लगता है
ऐसा मानो तेरे ये लाल लाल
फूल मानो दे रहें हो गवाही
इस बात की कि लहू का रंग
होता है लाल ही
फिर चाहे वो किसी का जीवन
बचाने के कम आये या फिर
कुछ सिरफिरों द्वारा
सड़कों पर बहाया जाये
सच कहता हूँ डर सा लगता
है देखकर लाल रंग ही
कि न जाने कब किसी
मेरे अपने का खून भी
मुझे दिख जाये किसी सड़क
पर इसी लाल रंग में

5 टिप्‍पणियां:

  1. पुष्प का लाल और खून का लाल, कितने अलग हैं दोनो..

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  2. मानवता को लेकर एक गंभीर चिंता इस कविता में रूपायित हो रही है. इसी तरह का सृजन मनुष्यता को बचा सकता है.

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  3. गहन चिंतन समाहित है इन पंक्तियों में.

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  4. आ चुकी परिपक्वता और बदलती वरीयता के साथ समकालीनता से ओत प्रोत कविता ...

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